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Thursday, October 1, 2020
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19 दिन पहले

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  • सांस तेज चलने और पैरों में हरकत कम होने के कारण बच्चे को आगरा से जयपुर के लेके लोन हॉस्पिटल लाया गया
  • हॉस्पिटल में तीन डॉक्टरों का एक दल बच्चे का इलाज कर रहा है, उनके मुताबिक, ऐसे मरीज बिना इलाज जिंदा नहीं रह पाते

जयपुर के सरकारी अस्पताल जेके लोन में भर्ती 44 दिन के एक बच्चे में दो दुर्लभ बीमारियां मिली हैं। उसमें पॉम्पे डिसीज और स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी-1 का पता चला है। अस्पताल के दुर्लभ बीमारी निदान केन्द्र के प्रभारी डॉ.अशोक गुप्ता के मुताबिक, बच्चे के लिए दवाएं उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। नवजात का इलाज तीन डॉक्टरों का एक दल कर रहा है। इस दल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रियांशु माथुर ने भास्कर को बताया, दो दुर्लभ बीमारियां एक नवजात में होने का यह दुनिया का पहला मामला है। जन्म के 25वें दिन बच्चे को आगरा से जयपुर लाया गया था। उसमें सांस तेज चलने के साथ पैरों में हरकत कम हो रही थी।

40 हजार लोगों में से किसी एक में पॉम्पे डिसीज का मामला सामने आता है। वहीं, एक लाख में से 1 या दो लोगों में ही स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी होता है।

समय पर पता चलने से इलाज आसान हुआ

डॉ. प्रियांशु माथुर ने बताया, इस मामले में सबसे अच्छी बात यह रही कि दोनों ही बीमारियों का पता समय पर चल गया है। आमतौर पर स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी डिसीज होने पर इसके लक्षण करीब 6 महीने बाद दिखते हैं जब बच्चा बैठ नहीं पाता। बीमारियों को पकड़ में आते-आते 9-10 महीने लग जाते हैं। पॉम्पे के लक्षण भी दो से ढ़ाई महीने बाद दिखते हैं। इसकी जांच की फेसिलिटी भी जयपुर में नहीं है। इसका पता चलने में 6-8 महीने लग जाते हैं।

पॉम्पे का शक होने पर जांच हुई

जन्म के 25वें दिन बच्चे को जयपुर लाया गया। पहले दिन ही पॉम्पे डिसीज का शक होने पर जांच हुई। अगले 4 दिन तक देखरेख के बाद बच्चे में स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी की आशंका जताई गई और इसकी भी जांच की गई। दोनों में से एक बीमारी का खतरा जताया गया था। लेकिन 40वें दिन जांच में दोनों दुर्लभ बीमारियां होने की बात सामने आई।

विदेशी कम्पनी से मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराईं
पॉम्पे की दवाएं काफी महंगी होती हैं। चेरिटेबल प्रोग्राम के तहत पॉम्पे की दवा तैयार करने वाली नीदरलैंड की दवा कम्पनी जेनजाइम से दवाएं मंगाई गईं। अस्पताल प्रशासन ने कम्पनी से दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराने का आग्रह किया। कम्पनी की ओर से अप्रूवल मिलते ही मुफ्त दवाएं बच्चे को उपलब्ध कराई गईं। जल्द ही स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी की थैरेपी भी उपलब्ध कराई जाएगी।

एक साल की दवा का खर्च करोड़ों में
डॉ. प्रियांशु माथुर के मुताबिक, बच्चे की बीमारी का इलाज शुरू कर दिया गया है। दवाएं भी उपलब्ध हो गई हैं। ऐसी बीमारी वाले मरीज बिना इलाज जीवित नहीं रह पाते। पॉम्पे डिसीज की दवा का एक साल का खर्च 25-30 लाख रुपए तक आता है। वहीं, स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी का खर्च 4 करोड़ रुपए सालाना तक आता है।

क्या है पॉम्पे और स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी
नेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर रेयर डिसऑर्डर के मुताबिक, पॉम्पे डिसीज एक रेयर मल्टीसिस्टम डिसऑर्डर है। इसके लक्षण जन्म से लेकर युवावस्था तक कभी भी दिख सकते हैं। इसके मरीजों में मांसपेशियों में कमजोरी, चलने-फिरने में दिक्कत, सांस लेने में तकलीफ होती है। इस बीमारी के कारण ग्लाइकोजन शरीर में ऊतकों में पहुंचकर उसे कमजोर बनाता है। यह एक आनुवांशिक बीमारी है जो एक से दूसरी पीढ़ी में भी जा सकती है।

स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफी के सबसे ज्यादा मामले बच्चों में सामने आते हैं। बीमारी होने पर मांसपेशियां काफी सख्त हो जाती हैं। ऐसा स्पाइनल कॉर्ड और ब्रेन में नर्व सेल के डैमेज होने से होता है। इस स्थिति में ब्रेन का संदेश मांसपेशियों को कंट्रोल करने वाले नर्व सेल्स तक नहीं पहुंच पाता। इसके मरीजों में चलने-फिरने, गर्दन को हिलाने और उसे कंट्रोल करने में दिक्कत होती है। कई बार स्थिति बिगड़ने पर खाना निगलने और सांस लेने में परेशानी भी हो सकती है।

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  • WHO News: World Health Organization (WHO) Update On Oxford AstraZeneca Coronavirus (Covid 19) Vaccine Trial

19 दिन पहले

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  • टेड्रोस ने एक सवाल के जवाब में कहा, जब हम बंट जाते हैं जो यह स्थिति वायरस के लिए एक मौका बन जाती है, एकता में कमी मुझे खलती है
  • WHO के सीनियर एडवाइजर डॉ. ब्रूस ने कहा के मुताबिक, हर ट्रायल की स्पीड एक जैसी नहीं हो सकती, यही सच्चाई है

अमेरिकी कम्पनी एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का ट्रायल रुकना कितना जरूरी था, इस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने गुरुवार देर शाम अपनी बात रखी। प्रेस कॉन्फ्रेंस में वैक्सीन से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए चीफ साइंटिस्ट सौम्या स्वामीनाथन ने कहा, ट्रायल के दौरान एक इंसान में जो साइडइफेक्ट दिखा, वो गंभीर था। यह हमारे लिए अलर्ट जैसा है।

क्लीनिकल ट्रायल्स में उतार-चढ़ाव आते हैं, हमें इसके लिए तैयार रहने की जरूरत है। हमें निराश होने की जरूरत नहीं। हमारे लिए दो चीजें सबसे ज्यादा जरूरी हैं। पहला, इंसान की सेफ्टी और दूसरा, वैक्सीन कितनी असरदार है। ट्रायल्स में आगे क्या होगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। हमें रिपोर्ट्स का इंतजार है। साल के अंत तक या नए साल की शुरुआत में वैक्सीन ट्रायल के सही नतीजे आएंगे।

वैक्सीन की रेस कम्पनी या देश के खिलाफ नहीं
वैक्सीन पर WHO के इमरजेंसी हेड माइक रेयान ने कहा, यह रेस लोगों को बचाने की है। यह रेस किसी कम्पनी या देश के बीच नहीं, यह वायरस के खिलाफ है। इसमें वक्त लगेगा क्योंकि हम चाहते हैं जो हो ईमानदारी से हो। अब तक महामारी के कारण 9 लाख लोगों की मौत हो चुकी है।

WHO की महामारी विशेषज्ञ मारिया वेन ने कहा, इस समय हम लोग वायरस को कंट्रोल करने की बेहतर स्थिति में हैं। इस महामारी का भविष्य में क्या असर दिखेगा, इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता। फिलहाल इस वायरस से सभी को मिलकर लड़ना होगा।

WHO के सीनियर एडवाइजर डॉ. ब्रूस ने कहा, हर ट्रायल की स्पीड एक जैसी नहीं हो सकती, यही सच्चाई है। लोगों पर ट्रायल करने के लिए उनकी भर्ती करनी पड़ती और एक तय प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

सिर्फ डेक्सामेथासोन दवा ही असरदार साबित हुई

WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम ने कहा, हमने कोविड-19 से लड़ने के लिए जो प्रोग्राम शुरू किया है, उसमें अब तक 38 बिलियन डॉलर की फंडिंग हुई है। यह हमारी जरूरत का मात्र 10 फीसदी ही है। टेड्रोस ने एक सवाल के जवाब में कहा, मुझे एक चीज जो परेशान करती है वो एकता की कमी। जब हम बंट जाते हैं जो यह स्थिति वायरस के लिए एक मौका बन जाती है।

कोविड-19 के गंभीर मरीजों के लिए डेक्सामेथासोन काफी असरदार दवा साबित हो रही है, जबकि दूसरी दवाएं इलाज में कारगर नहीं रही हैं। उनमें से कुछ का ट्रायल चल भी रहा है। करीब 180 वैक्सीन पर काम चल रहा है और 35 वैक्सीन ह्यूमन ट्रायल की स्टेज पर हैं।

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  • High Blood Pressure, Diabetes Affects Thinking; Here’s Latest Nature Communications Study

19 दिन पहले

  • रिसर्च में 22 हजार से अधिक लोगों की ब्रेन स्कैनिंग हुई, इनमें डायबिटीज के 1100 मरीज भी शामिल थे
  • डायबिटीज बढ़ने पर ब्रेन की नर्व डैमेज हो सकती हैं, इसलिए डिमेंशिया का रिस्क और भी बढ़ता है

डायबिटीज और ब्लड प्रेशर इंसान के दिमाग की संरचना बदल रहे हैं। इसलिए लोगों में सोचने की क्षमता और याददाश्त दोनों घट रही है। यह दावा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह बदलाव ब्रेन के ग्रे और व्हाइट मैटर वाले हिस्से में हो रहा है। रिसर्च में 22 हजार से अधिक लोगों की ब्रेन स्कैनिंग की गई। इनमें 1100 डायबिटीज के मरीज भी शामिल थे।

सबसे ज्यादा असर 44 से 69 साल की उम्र में दिखता है
रिसर्च के दौरान इन लोगों की तुलना स्वस्थ लोगों के साथ की गई। दोनों की याददाश्त का स्तर देखा गया और रिएक्शन टाइम जांचा गया। रिसर्च में सामने आया कि हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों के दिमाग पर सबसे ज्यादा असर 44 से 69 साल की उम्र में दिखता है। 70 साल से अधिक उम्र होने पर असर उतनी तेजी से नहीं दिखता।

जैसे-जैसे बीपी बढ़ता है दिमाग की परफॉर्मेंस घटती है

नेचर कम्युनिकेशन जर्नल में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक, जैसे-जैसे हाई ब्लड प्रेशर बढ़ता दिमाग की परफॉर्मेंस घटती जाती है। दिमाग के काम करने की क्षमता का एक सेकंड भी धीमा होना, बुरा असर छोड़ता है।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर मसूद हुसैन के मुताबिक, रिसर्च में हमने हृदय रोग और डायबिटीज से दिमाग पर पड़ने वाले असर को पता लगाने की कोशिश की है। इसका असर आने वाले समय में डिमेंशिया के रूप में पड़ सकता है।

प्रोफेसर मसूद हुसैन कहते हैं, दोनों ही बीमारी के रोगियों की एमआरआई के दौरान ब्रेन की संरचना जांची गई। डायबिटीज बढ़ने पर ब्रेन की नर्व डैमेज हो सकती हैं, इसलिए डिमेंशिया का रिस्क और भी बढ़ता है।

क्या होता है डिमेंशिया

डिमेंशिया भूलने की दिक्कत से अलग है। दरअसल, डिमेंशिया में हमारी सोचने-समझने की क्षमता लगातार कम होती जाती है। आम तौर पर इस बीमारी के लक्षण धीरे-धीरे दिखते हैं और वक्त गुजरने के साथ गंभीर होते जाते हैं। इसलिए अक्सर घरवाले भी इसे नोटिस नहीं कर पाते।

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  • China Coronavirus Vaccine Trail News; China Begins Phase I Human Testing For Covid 19 Nasal Spray Vaccine

19 दिन पहले

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  • इस वैक्सीन को शियामेन और हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी के साथ बीजिंग वेंताई बायोलॉजिकल फार्मेसी ने मिलकर तैयार किया
  • जल्द ही इसका ह्यूमन ट्रायल शुरू होगा, इसमें फ्लू का कमजोर स्ट्रेन वाला वायरस जो कोरोना से लड़ने की क्षमता बढ़ाएगा

चीन में बुधवार को नाक से दी जाने वाली वैक्सीन के ट्रायल को मंजूरी मिली। इसे शियामेन और हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी के साथ बीजिंग वान्ताई बायोलॉजिकल फार्मेसी ने मिलकर तैयार किया है। यह चीन की 10वीं वैक्सीन है, जिसका ह्यूमन ट्रायल नवम्बर में शुरू होगा।

वैज्ञानिकों का दावा है कि अब ट्रायल में शामिल लोगों को इंजेक्शन के दर्द से राहत मिलेगी, उन्हें नेजल स्प्रे से वैक्सीन दी जाएगी। पहले फ्लू महामारी को रोकने के लिए नेजल स्प्रे वैक्सीन को विकसित किया गया था, यह उन बच्चों और युवाओं को दी जाती थी जो इंजेक्शन से बचना चाहते हैं।

इम्यून रेस्पॉन्स बढ़ाएगा फ्लू का वायरस

अमेरिकी कम्पनी एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के बाद चीन फिलहाल दूसरे पायदान पर है। चीन के विज्ञान मंत्रालय के मुताबिक, नेजल स्प्रे में फ्लू का कमजोर स्ट्रेन वाला वायरस है, जिसमें कोरोना का स्पाइक प्रोटीन है। जब यह वैक्सीन नाक में पहुंचती है तो फ्लू का वायरस कोरोना की नकल करता है और इम्यून रेस्पॉन्स को बढ़ाता है ताकि शरीर कोविड-19 से लड़ सके।

दोहरी सुरक्षा देगी वैक्सीन
नेजल स्प्रे वैक्सीन के पहले ह्यूमन ट्रायल के लिए 100 वॉलंटियर्स की भर्ती होने जा रही है। हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता यूएन क्वोक-युंग के मुताबिक, तीनों ट्रायल्स को खत्म होने में करीब एक साल का वक्त लगेगा। ये वैक्सीन दोहरी सुरक्षा यानी इन्फ्लुएंजा और नॉवेल कोरोनावायरस से सुरक्षा देगी।

चूहे में फेफड़ों को डैमेज होने से रोका गया
इस वैक्सीन के प्री-क्लीनिकल ट्रायल के नतीजे बेहतर रहे हैं। ट्रायल रिपोर्ट के मुताबिक, यह वैक्सीन चूहे में फेफड़ों को डैमेज होने से रोकने कारगर साबित हुई है।

वैक्सीन के मामले में आगे निकलने की होड़ में चीन में पहले और दूसरे चरण की वैक्सीन का ट्रायल एक साथ करने की अनुमति दी गई थी। यहां की दो वैक्सीन सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। पहली, चीनी फर्म सिनोवेक बायोटेक की वैक्सीन ‘कोरोनावेक’ और दूसरी सिनोफार्म की वैक्सीन। दोनों ही वैक्सीन को पहली बार हाल ही में आयोजित हुए बीजिंग के ट्रेड फेयर में पेश किया गया।

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  • Coronavirus Recovered Patients Side Effects: Here’s Latest Study Updates From Korea Disease Control And Prevention Agency (KDCA)

22 मिनट पहले

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  • क्यूंगपूक नेशनल यूनिवर्सिटी ने कोरोना से रिकवर होने वाले 5762 में से 965 मरीजों का ऑनलाइन सर्वे किया

कोरोना से रिकवर होने वाला हर 10 में से एक मरीज इसके साइडइफेक्ट से जूझ रहा है। इलाज के बाद मरीजों में थकान, गंध-स्वाद का पता न चल पाना और एकाग्रता की कमी जैसे लक्षण दिख रहे हैं। यह दावा साउथ कोरिया में हुई स्टडी में किया गया है।

965 मरीजों पर हुई स्टडी
कोरोना से रिकवर होने वाले 965 मरीजों पर ऑनलाइन स्टडी की गई। कोरिया के सेंटर्स डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अधिकारी क्वॉन जून-वूक के मुताबिक, 91.1 फीसदी मरीजों में साइडइफेक्ट दिख रहा है।

26.2 फीसदी मरीज रीडिंग में मन नहीं लगा पा रहे
रिसर्च के मुताबिक, 26.2 फीसदी मरीज रीडिंग पर फोकस नहीं कर पा रहे हैं। उनमें एकाग्रता में कमी महसूस हो रही है। इसके अलावा मरीज गंध या स्वाद न पहचान पाने और दिमाग पर पड़ रहे नकारात्मक असर से परेशान हैं।

क्यूंगपूक नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर किन शिन-वू ने कोरोना से रिकवर हुए 5762 मरीजों में से 16 फीसदी कोरोना सर्वाइवर से ऑनलाइन सर्वे किया, जिसमें ये बातें सामने आईं।

16 संस्थानों के साथ मिलकर एक और स्टडी हो रही

प्रो. क्वॉन के मुताबिक, रिसर्च पूरी तरह ऑनलाइन की गई थी। जल्द ही इस पर और एनलिसिस करने के बाद रिसर्च को प्रकाशित करेंगे। साउथ कोरिया 16 संस्थानों के साथ मिलकर एक और स्टडी कर रहा है जिसमें मरीजों में दिखने वाले साइड इफेक्ट के असर को समझने की कोशिश की जा रही है। इस रिसर्च में मरीजों का सीटी स्कैन किया जा रहा है।

दक्षिण कोरिया में सोमवार को 38 नए संक्रमित मरीजों की पुष्टि हुई। देश में अब तक कुल 23,699 पॉजिटिव मामले पाए जा चुके हैं। कोरोना महामारी की वजह से वहां अब तक 407 लोगों की मौत हो चुकी है।

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  • Congo Fever: What Is Congo Fever Signs And Symptoms | Maharashtra Gujarat District On Alert Against Spread Of Congo Fever

25 मिनट पहले

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  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, कांगो बुखार तेजी से फैलने वाली बीमारी है, 10 से 40% मामलों में मरीज की मौत हो जाती है
  • संक्रमित जानवरों के खून के संपर्क में आने या इनका मांस खाने पर इंसानों में यह बीमारी पहुंच जाती है

गुजरात के कुछ इलाकों में कांगो फीवर के मामले सामने आए हैं। इसका हवाला देते हुए महाराष्ट्र के पालघर में प्रशासन ने अलर्ट जारी किया है। पशुपालन विभाग के डिप्टी कमिश्नर डॉ. प्रशांत कांबले ने कहा है कि गुजरात के कुछ इलाकों में यह बुखार पाया गया है। इसके महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों में फैलने की आशंका है। पालघर गुजरात के वलसाड जिले से लगा हुआ है। जानिए कांगो फीवर कब, क्यों और कैसे फैलता है…

Q-1. क्या है कांगो फीवर और कब दिखते हैं इसके लक्षण?

  • यह वायरल बीमारी खास तरह के कीट (किलनी) के जरिए एक जानवर से दूसरे जानवर में फैलती है।
  • संक्रमित जानवरों के खून के संपर्क में आने या ऐसे जानवरों का मांस खाने पर इंसानों में यह बीमारी फैलती है।
  • सही समय पर बीमारी का पता लगाकर इलाज नहीं किया गया तो 30% मरीजों की मौत हो जाती है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, इसके लक्षण दिखने में 6 से 13 दिन का समय लगता है।

Q-2. कहां से आया कांगो फीवर?
इस बीमारी का पहला मामला 1944 में यूरोप के क्रीमिया में आया था। लेकिन 1956 में अफ्रीका के कांगो में इसी वायरस के मामले सामने आए, इसलिए इस बीमारी का पूरा नाम क्रीमियन-कांगो फीवर रखा गया। हालांकि बोलचाल की भाषा में इसे कांगो फीवर ही कहा जाता है। अब इसका वायरस दूसरे देशों में भी पहुंच रहा है।

Q-3.कौन से लक्षण दिखने पर अलर्ट हो जाएं?

  • इससे संक्रमित होने वाले मरीजों में बुखार के साथ मांसपेशियों में दर्द होना, सिरदर्द और चक्कर आना जैसे लक्षण दिखते हैं।
  • कुछ मरीजों को सूर्य की रोशनी से दिक्कत होती है, आंखों में सूजन रहती है।
  • संक्रमण के 2 से 4 दिन बाद नींद न आना, डिप्रेशन और पेट में दर्द के लक्षण भी सामने आते हैं।
  • मुंह, गर्दन और स्किन पर चकत्ते आने के साथ हार्ट रेट भी बढ़ सकता है।

Q-4.क्या है इसका इलाज?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, लक्षण दिखने पर मरीजों को एंटीवायरल ड्रग दी जाती है। इसका इलाज ओरल और इंट्रावेनस दोनों तरह से किया जाता है। इसके 30 फीसदी मरीजों की मौत बीमारी के दूसरे हफ्ते में होती है। मरीज अगर रिकवर हो रहा है तो इसका असर 9वें-10वें दिन दिख जाता है।

इसकी अब तक कोई वैक्सीन नहीं तैयार की जा सकी है। वैक्सीन न होने के कारण बचाव ही इलाज है।

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  • Fact Check : Did The Scientists Of Italy Proved That There Is No Virus Named Covid 19? Know What Is The Truth Of The Message Going Viral

19 दिन पहले

क्या हो रहा है वायरल : सोशल मीडिया पर एक मैसेज वायरल हो रहा है। इसमें दावा किया जा रहा है कि इटली के वैज्ञानिकों ने अपनी नई रिसर्च में पाया है कि कोविड-19 जैसा कोई वायरस असल में है ही नहीं।

और सच क्या है ?

1200 शब्दों के इस मैसेज को तीन दावों में बांटकर हमने पड़ताल शुरू की।

WHO का कानून कोविड-19 से मरने वालों के शरीर का पोस्टमॉर्टम करने की अनुमति नहीं देता। लेकिन, इटली ने इस कानून को तोड़कर लाशों का पोस्टमॉर्टम किया। और पाया कि कोविड-19 एक वायरस नहीं बैक्टीरिया है।

सच : WHO की वेबसाइट पर हमें ऐसे किसी नियम का उल्लेख नहीं मिला। जो कोविड-19 से संक्रमित मरीज की लाश का पोस्टमॉर्टम या किसी भी तरह की रिसर्च करने से रोकता हो।

WHO के स्पोक्सपर्सन दैनिक भास्कर को ई-मेल पर दिए एक जवाब में पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं कि – हम किसी भी देश पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकते।

कोविड-19 नाम का कोई वायरस अस्तित्व में है ही नहीं ये एक ग्लोबल घोटाला है। लोग कोरोना वायरस से नहीं बल्कि ”5G इलेक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन ज़हर” के कारण मर रहे हैं।

सच : WHO हर सप्ताह एक सिचुएशन रिपोर्ट जारी करता है। इसमें कोविड-19 से संक्रमित मरीजों की संख्या और इससे होने वाली मौतों के आंकड़े होते हैं। ये आंकड़े सदस्य देश ही संगठन को उपलब्ध कराते हैं। 6 सितंबर की रिपोर्ट में इटली में पिछले सात दिनों में कोविड-19 के 9,485 नए केस बताए गए हैं।

जाहिर है जब इटली खुद कोविड-19 के नए मामलों के बारे में दुनिया को बता रहा है, तो वह मानता है कि कोविड-19 एक वायरस है।

इटली के वैज्ञानिकों ने पाया कि कोरोना वायरस का इलाज एंटीबायोटिक्स से हो सकता है।

सच: रायटर्स की खबर के अनुसार, 24 अगस्त को इटली ने कोविड-19 वैक्सीन का ह्यूमन ट्रायल शुरू कर दिया है। अगर वहां कोविड-19 का इलाज एंटीबायोटिक्स से हो रहा होता तो इटली वैक्सीन का परीक्षण नहीं करता।

  • इन सबसे स्पष्ट है कि वायरल मैसेज में किए जा रहे तीनों दावे मनगढ़ंत और फेक हैं। मैसेज में कुछ साइंटिफिक शब्दों का इस्तेमाल करके इस तरह फ्रेम किया गया है कि लोग इसे सच मानकर शेयर करें।

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  • Oxford Coronavirus Vaccine Trial Paused | Here’s What You Need To Know After Astrazeneca Pauses Coronavirus Vaccine Study

19 दिन पहले

  • पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के श्रीनाथ रेड्डी के मुताबिक, हो सकता है वायरस खत्म न हो, इसलिए बचाव करना जरूरी
  • प्लाज्मा थैरेपी भी पूरी तरह कारगर इलाज नहीं साबित हुई लेकिन भारत का रिकवरी रेट 77 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का ट्रायल हाल ही में रोका गया है। इसका भविष्य में क्या असर पड़ेगा। इस पूरे मामले पर पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, भारत में तीन वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है, ऑक्सफ़ोर्ड उनमें से एक है, जिसका ट्रायल रोका गया है। बाकी दो में सफलता मिल सकती है।

उन्होंने कहा, ऑक्सफ़ोर्ड की वैक्सीन अभी खारिज नहीं हुई है। इसके एक वॉलंटियर की रीढ़ की हड्डी में कुछ परेशानी आई है, जिसके बाद सिर्फ ट्रायल रोका गया है। इसकी जांच ऐसे वैज्ञानिक कर रहे हैं जो हमेशा वैक्सीन पर ही काम करते आए हैं। अगर इस जांच में पाया गाया कि ऐसा वैक्सीन के कारण हुआ है, या किसी अन्य वॉलंटियर में भी यह समस्या आई तो इसे खारिज कर दिया जाएगा।

वैक्सीन कब मिलेगी
डॉ. रेड्डी कहते हैं कि पूरी दुनिया में 32 वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। उम्मीद है कि जल्द ही कहीं न कहीं ट्रायल सफल हो जाएगा। लेकिन यह भी हो सकता है कि वायरस कभी खत्म न हो, इसलिए इससे बचाव करना जरूरी है। इसके लिए जो भी नियम बनाए गए हैं, उनका पालन करें। कम से कम एक साल तक मान सकते हैं कि वायरस ऐसे ही परेशान करता रहेगा। वैक्सीन आने के बाद भी पूरी दुनिया में वैक्सीन पहुंचने में समय लगेगा। इसलिए लापरवाही नहीं करनी है।

मौत रोकने में प्लाज्मा थैरेपी कारगर नहीं
कोरोना के बढते केस में भारत का रिकवरी रेट 77 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया है, वायरस से लोगों को बचाने के लिए चिकित्साकर्मी कई दवाइयों का प्रयोग कर रहे हैं। हांलांकि ICMR ने प्लाज्मा थैरेपी को ज्यादा कारगर नहीं बताया है।

डॉ. रेड्डी के मुताबिक, जब वायरस को कंट्रोल करने के लिए कोई दवा नहीं थी, तब प्लाज्मा थैरेपी को एक ट्रायल के तौर पर अनुमति दी गई। क्योंकि यह कई बीमारियों में पहले मृत्यु दर को कम करने में मददगार रही है। शुरुआत में कुछ लोगों को फायदा भी हुआ, लेकिन पिछले दिनों से कुछ मरीजों पर बहुत फायदा नहीं दिखा। इसलिए अभी इसे पूरी तरह कारगर इलाज नहीं कह सकते।

बच्चों को जरूर लगवाएं टीका

अनलॉक में भी लोगों में वायरस का डर बना हुआ है, वे नवजात को लगने वाला जरूरी टीका भी नहीं लगवा रहे हैं। इस पर डॉ. रेड्डी का कहना है कि बच्चे के स्वास्थ्‍य के लिए टीकाकरण बहुत जरूरी है, इसलिए अगर कोई टीका नहीं लग पाया है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। जहां तक कोरोना के संक्रमण की बात है, तो बच्चों में अभी तक कोरोना का असर काफी कम रहा है। दरअसल कई बीमारियां होती हैं, जिनका टीका लगवाना बहुत जरूरी है।

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  • Coronavirus Infection Photos, Covid 19 Cells Updates In Pictures; What It Looks Like When Infected With Corona

18 दिन पहले

  • अमेरिका के यूएनसी स्कूल ऑफ मेडिकल लेबोरेट्री ने सांस की नली में होने वाले संक्रमण को लैब में क्रिएट किया
  • इंसानी कोशिकाओं में कोरोनावायरस को इंजेक्ट किया और 96 घंटों तक नजर रखी गई

कोरोना से संक्रमित होने पर कोशिकाएं कैसी दिखती हैं, इसकी तस्वीर अमेरिकी शोधकर्ताओं ने जारी की है। वैज्ञानिकों ने लैब में इंसान की ब्रॉन्कियल एपिथीलियल कोशिकाओं में कोरोना को इंजेक्ट किया। इसके बाद कोशिकाओं में फैलने वाले वायरस की तस्वीरों को कैप्चर किया। कोशिकाओं में गुलाबी रंग वाली संरचना कोरोनावायरस की है। यह कोशिकाओं पर बढ़ते हुए गुच्छे के रूप में दिख रहा है।

अमेरिका के यूएनसी स्कूल ऑफ मेडिकल लेबोरेट्री ऑफ कैमिल एहरे की रिपोर्ट के मुताबिक, ये तस्वीरें सांस नली में संक्रमण की हैं। सांस की नली में कोरोना का संक्रमण कैसे बढ़ता है, इनसे समझा जा सकता है। ये तस्वीरें न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुई हैं।

रिसर्चर कैमिल के मुताबिक, इंसान की ब्रॉन्कियल एपिथीलियल कोशिकाओं में कोरोना को इंजेक्ट करने के बाद 96 घंटों तक नजर रखी गई। इसे इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से देखा गया। इमेज में रंगों को शामिल करके वायरस की सही तस्वीर दिखाने की कोशिश की गई।

तस्वीर में नीले रंग में दिखने वाली लम्बी संरचनाओं को सीलिया कहते हैं। जिसकी मदद से फेफड़ों से म्यूकस को बाहर निकाला जाता है। वायरस के संक्रामक प्रकार को वायरियॉन्स कहते हैं। जो लाल रंग के गुच्छे के रूप में दिख रहे हैं।

अब मौत के खतरे को समझने की कोशिश जारी
रिसर्चर्स के मुताबिक, ऐसी तस्वीरों से वायरल लोड को समझने में आसानी हो रही है। इसके साथ ही अलग-अलग जगहों पर वायरस ट्रांसमिशन कैसे और कितना होता है, यह समझा जा रहा है। कोरोनावायरस से मौत का खतरा कितना है, अब इसे समझने के लिए भी रिसर्च की जा रही है।

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  • Cat Que Virus Icmr Warns Of Another Chinese Virus Which Could Spread Disease In Country All You Need To Know About Cat Que Virus

23 मिनट पहले

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  • कैट क्यू वायरस सुअर और क्यूलेक्स मच्छरों के जरिए फैलता है
  • इसके संक्रमण के सबसे ज्यादा मामले चीन और वियतनाम में मिले हैं

कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने एक और वायरस का खतरा जताया है। ICMR के मुताबिक, चीन और वियतनाम में पाया जाने वाला कैट क्यू वायरस भारत में भी संक्रमण फैला सकता है।

देश में 883 लोगों के सीरम सैम्पल की जांच की गई, इसमें दो लोगों में कैट क्यू वायरस के खिलाफ काम करने वाली एंटीबॉडीज मिली हैं। एंटीबॉडीज शरीर में तभी मिलती हैं जब उससे जुड़े वायरस का संक्रमण हुआ हो।

मच्छर और सुअर से फैलता है कैट क्यू वायरस
ICMR के संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के मुताबिक, इस वायरस के सबसे ज्यादा मामले चीन और वियतनाम में देखे गए हैं। यह वायरस क्यूलेक्स मच्छरों और सुअरों से फैलता है। देश में 2014 से 2017 के बीच सीरम कलेक्ट किया गया था।

इसकी जांच के दौरान 2 लोगों में कैट क्यू वायरस के खिलाफ एंटीबॉडीज मिलीं। इससे एक बात साफ है कि इनमें इस वायरस का संक्रमण हुआ है। हालांकि, अब तक भारत में यह वायरस किसी भी इंसान या जानवरों में नहीं मिला है।

दोनों ही मामले कर्नाटक से जुड़े
जिन दो लोगों में कैट क्यू वायरस की एंटीबॉडी (Anti-CQV IgG) मिली हैं, वो कर्नाटक से हैं। ICMR के मुताबिक, इंसानों और सुअरों के सीरम सैंपल्स की जांच होनी चाहिए ताकि पता चल सके कि कहीं यह वायरस हमारे बीच पहले से ही मौजूद तो नहीं है। भारत में क्यूलेक्स मच्छर की प्रजाति का विस्तार होने से इस वायरस का संक्रमण फैलने की आशंका जताई जा रही है।

कितना खतरनाक है कैट क्यू वायरस
यह खासतौर पर चीन और वियतनाम में क्यूलेक्स मच्छरों और सुअरों में पाया जाता है। यह वायरस खतरनाक है या नहीं, अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। इसका संक्रमण इंसेफेलाइटिस और मेनिनजाइटिस जैसे रोगों की वजह बन सकता है। मरीजों में बुखार, सिरदर्द जैसे लक्षण दिख सकते हैं।

चीन के सुअरों में बड़े पैमाने पर इसके खिलाफ एंटीबॉडीज मिल चुकी हैं। यह इस बात का संकेत है कि वहां वायरस फैल रहा है। इसमें मच्छरों और सुअरों के जरिए दूसरे जानवरों में फैलने की भी क्षमता है।

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