corona helpline Is the patient being told by the patient corona sufferer even if he is healthy and treatment of other diseases is being stopped | क्या स्वस्थ होने पर भी मरीज को डॉक्टर कोरोना पीड़ित बता रहे हैं और दूसरी बीमारियों का इलाज रोका जा रहा है

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24 दिन पहले

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देश में कोरोना को आए 6 महीने से भी ज्यादा हो गया है। बढते संक्रमण को रोकने के लिए देश में टेस्टिंग बढ़ा दी गई है। ऐसे में अगर कोई इंसान पहले से किसी बीमारी से जूझ रहा है और वो कोरोना पॉजिटिव आता है, तो क्या उसकी दूसरी बीमारी का इलाज या होने वाली सर्जरी रोक दी जाएगी?

इस सवाल का जवाब देते हुए राम मनोहर लोहिया अस्पताल, नई दिल्ली के डॉ. एके वार्ष्‍णेय ने बताया, इस वक्त कोई भी बीमारी हो, अस्‍पताल जाते ही सबसे पहले कोरोना टेस्‍ट किया जाता है। दूसरी बात, पॉजिटिव होने पर इलाज रोका नहीं जाता है, बस डॉक्टर, नर्स व स्‍वास्‍थ्‍यकर्मी अतिरिक्त सावधानी बरतते हैं। कई बार इमरजेंसी में सर्जरी करनी पड़ती है, तो अगर मरीज कोरोना पॉजिटिव है तो डॉक्‍टर सावधानी के साथ सर्जरी करते हैं।

क्या वाकई में स्वस्थ इंसान को पॉजिटिव बताते हैं?
कई लोगों की शिकायत होती है कि कोरोना न होने पर भी पॉजिटिव बता दिया जाता है। इस पर डॉ. एके वार्ष्‍णेय ने प्रसार भारती से बात करते हुए कहा, कई बार मरीज मानने को तैयार नहीं होता है कि वो कोरोना पॉजिटिव है। ऐसे लोगों को लगता है कि कोरोना बहुत सीरियस बीमारी है, और मुझे तो कोई लक्षण नहीं हैं, फिर भी मुझे पॉजिटिव क्यों बताया जा रहा है। यहां से कंफ्यूजन शुरू होती है।

वो सोचता है हल्‍का खांसी-बुखार है, यह कोरोना कैसे हो सकता है। यह भी सोचिए कि एंटीजन टेस्‍ट में तो कई बार पॉजिटिव मरीजों की रिपोर्ट भी निगेटिव आती है। इसलिए डॉक्‍टर की बात मानें और नियमों का पालन करें।

एसिम्‍प्‍टोमैटिक में फेफड़ों में होने वाला डैमेज कितना?
अब एसिम्‍प्‍टोमैटिक मरीजों को भी डर सताने लगा है कि क्या उन्हें भी फेफड़ों से जुड़ी परेशानी आ रही है। इस बारे में डॉ. वार्ष्‍णेय ने कहा, संक्रमण के एक हफ्ते के बाद शरीर में आईजीएम एंटीबॉडी बनते हैं, और दो हफ्ते के बाद आईजीजी एंटीबॉडी बनते हैं। ये एंटीबॉडी रोगों से लड़ने क्षमता को बढ़ा कर वायरस नष्‍ट कर देते हैं। ऐसे अधिकांश लोगों में लक्षण नहीं आते हैं या बहुत कम आते हैं।

ये लोग एसिम्‍प्‍टोमैटिक होते हैं। इनको कोई तकलीफ नहीं होती है, लेकिन ऐसा पाया गया है कि ऐसे लोगों में तीन-चार हफ्ते बाद सांस लेने में दिक्कत आती रही है, या बहुत थकावट हो रही है। उससे पहले उनको सांस की कोई बीमारी नहीं थी। इसका मतलब साइलेंट इंफेक्शन के दौरान फेफड़ों में थोड़ा-बहुत डैमेज हो जाता है। हालांकि यह वायरस नया है, इस पर रोज नए शोध हो रहे हैं। फिलहाल यह माना जा रहा है कि एसिम्‍प्‍टोमैटिक लोगों के फेफड़ों में जो परेशानी आई है, वो थोड़े दिनों में खत्म हो जाएगी।

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