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In the UAE, ‘liquid nanoclay’ method, fruits like watermelon and gourd were grown in the desert, it also saved 45 percent water. | रेगिस्तान में उगाए तरबूज और लौकी जैसी फल-सब्जियां, इससे 45 फीसदी पानी की बचत भी हुई; अब ‘लिक्विड नैनोक्ले’ विधि को बड़े स्तर पर अपनाने की तैयारी – health blogs

In the UAE, ‘liquid nanoclay’ method, fruits like watermelon and gourd were grown in the desert, it also saved 45 percent water. | रेगिस्तान में उगाए तरबूज और लौकी जैसी फल-सब्जियां, इससे 45 फीसदी पानी की बचत भी हुई; अब ‘लिक्विड नैनोक्ले’ विधि को बड़े स्तर पर अपनाने की तैयारी

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5 दिन पहले

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  • एक वर्ग मीटर जमीन पर इस तकनीक का खर्च करीब 150 रुपए तक आ रहा
  • अब लिक्विड नैनोक्ले की फैक्ट्री लगाकर इसका व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू करने की तैयारी

लॉकडाउन में 40 दिन के प्रयोग के बाद यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) ने यह साबित कर दिया कि रेत में भी तरबूज और गिलकी जैसे फल-सब्जी की खेती की जा सकती है। यूएई रेत से घिरा देश है, जो अपने ताजे फल-सब्जी की 90% जरूरत आयात कर पूरी करता है। उसके लिए रेगिस्तान को फल और सब्जी के बागों में तब्दील हो जाने की आशा किसी अजूबे से कम नहीं।

वैज्ञानिकों को रेगिस्तान में यह सफलता ‘लिक्विड नैनोक्ले’ पद्धति यानी गीली चिकनी मिट्टी के कारण मिली है। ये मिट्टी को पुनर्जीवित करने की तकनीक है। इस पद्धति में पानी का इस्तेमाल 45% कम हो जाएगा। इस सफलता के बाद यूएई अब लिक्विड नैनोक्ले की फैक्ट्री लगाकर इसका व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू करने जा रहा है।

मिट्‌टी और रेत में पॉजिटिव और निगेटिव चार्ज काम आया
लिक्विड नैनोक्ले तकनीक में चिकनी मिट्टी के बहुत छोटे-छोटे कण द्रव्य के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। अब यहां सवाल उठता है कि इस मिट्टी को रेत के साथ कैसे मिलाया जाए ताकि ये कारगर सिद्ध हों। यहां सॉइल केमिस्ट्री के कैटॉनिक एक्सचेंज कैपेसिटी’ के सिद्धांत का उपयोग किया गया। रासायनिक संरचना के कारण चिकनी मिट्टी के कण में निगेटिव चार्ज होता है, जबकि रेत के कण में पॉजिटीव चार्ज।

नैनोक्ले पद्धति को विकसित करने वाली नॉर्वे की कंपनी डेजर्ट कंट्रोल के चीफ एग्जीक्यूटिव ओले सिवटर्सन का कहना है कि विपरीत चार्ज होने के कारण जब चिकनी मिट्टी का घोल रेत से मिलता है, तो वो एक बांड बना लेते हैं और जब इन्हें पानी मिलता है तब उसके पोषक तत्व इनके साथ चिपक जाते हैं। इस तरह ऐसी मिट्टी तैयार हो जाती है, जो पानी को रोक सकती है और जिसमें पौधे जड़ पकड़ सकते हैं।

वैसे तो 15 साल से यह टेक्नोलॉजी अस्तित्व में है, लेकिन दुबई के इंटरनेशनल सेंटर फॉर बायो सलाइन एग्रीकल्चर में 12 माह से इस पर प्रयोग हो रहा है।

शिपिंग कंटेनर में बनेगी लिक्विड नैनोक्ले की फैक्ट्री
सिवटर्सन का कहना है कि 40 स्क्वेयर फीट के शिपिंग कंटेनर में लिक्विड नैनोक्ले की फैक्ट्री लगाई जाएगी। ऐसे अनगिनत कंटेनर रेत प्रधान देशों में लगाए जाएंगे ताकि स्थानीय मिट्टी से उस देश के रेगिस्तान में खेती की जा सके। ऐसे हरेक कंटेनर से 40 हजार लीटर लिक्विड नैनोक्ले प्रति घंटे की – रफ्तार से उत्पादित किया जाएगा।

इसका इस्तेमाल यूएई के सिटी पार्कलैंड में 1 किया जाएगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस पद्धति में पानी का इस्तेमाल 45% कम हो जाएगा। फिलहाल एक वर्ग मीटर जमीन पर इस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर दो डॉलरयानी करीब 150 रुपए का खर्च आता है।

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